
ग्रामोफोन पर घूमता था आरा का बचपन, और भीड़ में खड़ी थी पैंट-शर्ट वाली वो लड़की
70-80 के दशक में MP बाग के दुर्गा पूजा पंडाल की वो कर्णप्रिय धुन आज भी करती है सिहरने पर मजबूर
आज दुर्गा पूजा पंडालों के बाहर कान फाड़ते DJ के बीच अगर कहीं खर-खर करती ग्रामोफोन की वो मीठी धुन सुनाई दे जाए, तो समझिए आप 1975 के आरा में लौट आए हैं।
उस दौर में पंडाल का असली हीरो दुर्गा माँ की मूर्ति नहीं, उसके सामने रखा काले रंग का ग्रामोफोन होता था।
उसके तवे पर काला रिकॉर्ड घूमता... सुई टिकती... और फिर गूंजता - "दुनिया का मेला, मेले में लड़की, अकेली..."
बस, फिर क्या था! पंडाल के सामने गिल्ली-डंडा खेलते हम लड़कों के पैर खुद-ब-खुद थिरकने लगते थे।
वो अजूबा जिसे छूना मना था
ग्रामोफोन हमारे लिए NASA के रॉकेट से कम नहीं था। तवे पर घूमते उस काले तवे से आवाज निकलती कैसे है? हम घंटों मिस्त्री के चारों तरफ मंडराते। मिस्त्री डांटता, भगाता - "ए भागो, सुई टूट जाएगी!" पर कौन सुनता? वो भीड़ ही हमारा बचपन थी।
उस भीड़ में एक बात कॉमन थी - सब लड़के थे। लड़कियों का पंडाल के पास फटकना भी उस जमाने में 'बड़ी बात' मानी जाती थी।
पर हर भीड़ में एक विद्रोह होता है।
और उसी भीड़ में थी - फूल कुमारी
MP बाग की फूल कुमारी। आज 55 साल की। शादी के बाद आसनसोल में हैं, पर फोन पर बात करते ही आरा वाली फूल बन जाती हैं।
वो कहती हैं, "गानों की धुन तो मीठी थी ही, बोल दिल में चुभते थे। 'मेले में लड़की, लड़की अकेली' सुनकर लगता था जैसे मेरे बारे में ही तो नहीं गा रहे?"
"उस जमाने में लड़कियों पर पाबंदियां बहुत थीं। इसलिए मैं जान-बूझकर लड़कों जैसी पैंट-शर्ट पहन लेती थी। उसी में घुस जाती थी लड़कों की भीड़ में। घंटों ग्रामोफोन देखती रहती थी।"
वो हंसते हुए कहती हैं, "लड़कों की भीड़ में लड़की का होना भी एक जुनून था।"
आज DJ है, लेजर लाइट है, पर वो ग्रामोफोन वाली मासूमियत नहीं। और शायद इसीलिए फूल कुमारी जैसी कहानियां हमें बताती हैं कि आरा सिर्फ एक शहर नहीं, एक एहसास है जो आसनसोल में भी जिंदा है।
